Red Book Astrology

लाल किताब १९५२ ज्योतिर्विज्ञान का एक अद्वितीय ग्रंथ है। इसके मूल रचयिता के रूप में पं० रूपचन्द जोशी जी को स्वीकार किया जाता है। भारत के पंजाब प्रांत के ग्राम फरवाला, जिला जालंधर के निवासी पं० रूपचन्द जोशी जी ने इसे १९५२ ई० में हम सब के कल्याण के उद्देश्य से प्रकाशित करवाया। इस किताब को मूल रूप से उर्दू एवं फारसी भाषा में लिखा गया है।
लाल किताब १९५२ पूर्व में प्रकाशित ४ संस्करणों का समुच्चय है, अर्थात् चारों का योग है, इसके ४ पूर्व संस्करण निम्नलिखित हैं-
फरमान १९३९
अरमान १९४०
गुटका १९४१
तरमीम शुदा १९४२
लाल किताब व्याकरण, अन्य प्रचलित ज्योतिष विद्याओं से कुछ भिन्न हैं। यदि हम भाषा पर जायें तो यह आम लोगों की बोलचाल वाली भाषा में लिखी गई है। उत्तर भारत के प्राचीन पंजाब के लोग इसे आशानीपूर्वक समझ सकते हैं परन्तु अन्य प्रांतों के लोग चाहे वे उर्दू जानते हों इसे समझने में कठिनाई महसूस करेंगे। जैसे तुलसीदास जी ने आम लोगों के लिये ‘रामचरितमानस’ लिखा था, उसी तरह पं० रूपचन्द जोशी जी ने ज्योतिष विद्या का यह ग्रंथ आम लोगों के लिये ही लिखा था।
लाल किताब ज्योतिर्विद्या की एक स्वतन्त्र और मौलिक सिद्धान्तों पर आधारित एक अनोखी पुस्तक है। इसकी कुछ अपनी निजी विशेषताएँ हैं, जो अन्य सैद्धान्तिक अथवा प्रायोगिक फलित ज्योतिष-ग्रन्थों से हटकर हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता ग्रहों के दुष्प्रभावों से बचने के लिए जातकों को उपाओ का सहारा लेने का संदेश देना है। ये उपाओ इतने सरल हैं कि कोई भी जातक इनका सुविधापूर्वक सहारा लेकर अपना कल्याण कर सकता है। काला कुत्ता पालना, कौओं को खिलाना, कुंवारी कन्याओं से आशीर्वाद लेना, किसी वृक्ष विशेष को जलार्पण करना, कुछ अन्न या सिक्के पानी में बहाना, चोटी रखना, सिर ढँक कर रखना इत्यादि ऐसे कुछ उपाओ के नमूने हैं, जिनके अवलम्बन से जातक ग्रहों के अनिष्टकारी प्रभावों से अनायास ही बच जाता है। महंगे ग्रह रत्नों जैसे माणिक्य, मूंगा, मोती, पुखराज, नीलम, हीरा, पन्ना आदि में हजारों रुपयों को खर्च करने के बजाय जातक इन उपाओ के सहारे अत्यल्प खर्च द्वारा ग्रहों के दुष्प्रभावों से अपनी रक्षा कर सकता है।
लाल किताब ज्‍योतिष की ऐसी पुस्‍तक है जो पारंपरिक ज्‍योतिष की तरह कुण्‍डलियों के विश्‍लेषण को दरकिनार कर अपनी पद्धति पेश करती है। इसके अनुसार राशियों की चाल का कोई महत्‍व नहीं है। लग्‍न हमेशा मेष राशि होगी और इसी तरह बारह भावों में बारह राशियां स्थिर कर दी गई हैं।
उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न के जातक की कुण्‍डली भी बनाई जाए तो भी लग्‍न मेष ही रहेगा। शेष ग्रह जिस भाव में बैठे हैं उन्‍हीं का इस्‍तेमाल किया जाएगा। ऐसे में कोई ग्रह उच्‍च या नीच का होगा तो भावों में स्थिति की वजह से होगा।
जो ग्रह खराब प्रभाव वाले हैं उन्‍हें अपने स्‍थान से हटाकर दूसरे स्‍थानों पर ले जाया जा सकता है।
अगर सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो हकीकत में खगोलीय पिण्‍डों को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर खिसकाना असंभव है, लेकिन लाल किताब कहती है कि ग्रहों को भले ही न खिसकाया जा सकता हो, लेकिन जातक की कुण्‍डली में उसके प्रभाव को बदला जा सकता है।
हर ग्रह के प्रभाव को बदलने के लिए लाल किताब ने तय सिद्धांत भी बनाए हैं। मसलन किसी ग्रह को लग्‍न में लाने के लिए उससे संबंधित रत्‍न, धातु अथवा वस्‍तु को गले में पहनना होगा। इससे ग्रह का असर ऐसा होगा कि वह लग्‍न में बैठा है।
इसी तरह दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए घर में वस्‍तु स्‍थापित करें, तीसरे भाव के लिए हाथ में, चौथे के लिए बहते पानी में, पांचवे के लिए स्‍कूल में, छठे के लिए कुएं में, सातवें के लिए जमीन में, आठवें के लिए श्‍मशान में, नौंवे के लिए धर्मस्‍थान में, दसवें के लिए सरकारी प्‍लाट या भवन में और बारहवें भाव में किसी वस्‍तु को पहुंचाने के लिए छत पर संबंधित वस्‍तुओं को रखना होगा।
लाल किताब कहती है कि ग्‍यारहवां भाव आय या लाभ का होता है, इस भाव के लिए कोई उपचार नहीं है। उपायों से ग्रहों को अपने पक्‍के या बेहतर लाभ देने वाले भावों में पहुंचाने और खराब प्रभाव देने वाले ग्रहों को हटाने का प्रयास किया जाता है।